जनप्रतिनिधित्व अधिनियम की अनदेखी
लोकसभा चुनाव के लिए पहले चरण का मतदान कल यानि 11 अप्रैल से शुरू हो जाएगा। इस चरण के लिए चुनाव प्रचार 9 अप्रैल को शाम पांच बजे समा’ हो गया था। पहले चरण में यूपी के कई क्ष्ोत्रों में व उत्तराखंड में चुनाव होने हैं। चुनाव हों और उसको लेकर कोई अपवाद न हो, ऐसा हो ही नहीं सकता है। राजनेता जिस तरह संविधान और चुनाव आयोग की गाउडलाइन का मजाक बनाते हैं, ऐसे बहुत से उदाहरण चुनावी दौर में देखने को मिलते हैं। इस बार भी ऐसे कई मामले सामने आए हैं। चाहे वह आचार संहिता को ठेंगा दिखाने की बात हो या फिर समाज को धर्म-जाति व सम्प्रदाय के नाम पर बांटने की कोशिश।
यहां महज एक उदाहरण लेते हैं। यह वाक्या है सहारनपुर का। यहां एक जनसभा में बसपा सुप्रीमो मायावती ने खुलकर मुस्लिम मतदाताओं से कहा कि अपना वोट बंटने न दें, बल्कि वे एकमुश्त होकर बसपा-सपा और रालोद प्रत्याशियों को ही वोट दें। मायावती द्बारा इस तरह से वोट मांगने का तरीका चुनावों के लिए बनाए गए जनप्रतिनिधित्व अधिनियम-1951 कानून के पूरी तरह खिलाफ है। इस कानून के तहत धार्मिक आधार पर वोट मांगने की सख्त मनाही है। इसके बाद भी अगर, मायावती ने खुली सभा में धार्मिक आधार पर वोट मांगे तो क्या यह जनप्रतिधित्व अधिनियम के खिलाफ नहीं है। हमेशा हम धर्मनिरपेक्ष देश व समाज में रहने की बात करते हैं, अगर, उसके बाद भी हम अपने राजनीतिक फायदे व महत्वाकांक्षा के लिए समाज व देश को धर्म-जाति व सम्प्रदाय के नाम पर बांटने की कोशिश करते हैं तो यह निहायत ही गलत और देश के संविधान के मूल के खिलाफ है।
उत्तर प्रदेश जैसे राज्य में इस तरह के वाक्ये पहले भी सामने आते रहे हैं, जब कुछ पार्टियां इस बात को मानकर चलती हैं कि विश्ोष समुदाय और जाति के लोग सिर्फ उन्हीं को वोट करेंगे। वोट के आकड़ों से भले ही यह पता चलता भी है तो इसमें कोई गुरेज नहीं है। संबंधित लोगों की किस पार्टी और विचारधारा में अधिक आस्था है, यह वह ही बता सकता है, लेकिन जब एक जनप्रतिनिधि खुले तौर पर वोट मांगता है तो इसका मतलब तो यही है कि वह समाज को धर्म-जाति और सम्प्रदाय के रूप में बांट रहा है। समाज में साम्प्रदायिक उन्माद को फैलाने की कोशिश करता है। इस तरह का उदाहरण मायावती से ही जोड़कर नहीं देखा जा रहा है बल्कि दूसरी पार्टियां भी इस तरह की स्थितियों को पैदा करने की कोशिश करती रहती हैं। इसका कारण यही है कि आज समाज के अंदर इस तरह का खांचा तैयार हो गया है, जिसमें हर कोई स्वयं को एक-दूसरे से अलग पाता है। एक-दूसरे से डर की भावना उसके अंदर बनी रहती है। यह स्थिति तब और खतरनाक हो जाती है, जब कोई राजनीतिक पार्टी सत्ता हासिल करने में सफल हो जाती है और उस जाति व सम्प्रदाय के लोगों के लिए काम नहीं करती है,जो उसके वोट बैंक का हिस्सा नहीं होता है। यह स्थिति देश के संविधान के मूल के खिलाफ है। देश का मूल धर्मनिरपेक्षता है। भारत को दुनिया का सबसे बड़ा और सफल लोकतंत्र बनाने में इसी मूल की सबसे बड़ी ताकत रही है, लेकिन लोकतांत्रिक इतिहास के पन्ने खोदकर देख्ों तो हमारी राजनीतिक पार्टियों ने देश को एकसूत्र में बांधने के बजाय उन्हें धर्म-जाति और सम्प्रदाय के खांचों में बांट दिया। इसके पीछे महज उनकी राजनीतिक महत्वाकांक्षा जिम्मेदार रही है। इन मुद्दों को लेकर राजनीतिक पार्टियों के पास बहुत सारे तथ्य हैं, लेकिन देश के विकास को लेकर उनके पास कोई भी खाका नहीं है। यही वजह है कि आजादी के लंबे अर्से के बाद भी देश में गरीबी, अशिक्षा और आर्थिक असमानता बनी हुई है।
देश में किसानों की हालत किसी से छुपी नहीं है, वे आत्महत्या करने के लिए मजबूर हो रहे हैं। देश भ्रष्टाचार, कालाबाजारी के मकड़जाल में ऐसा फंसा हुआ है कि उसे इन परिस्थितियों से निकलने में बहुत लंबा समय लगेगा। समाज में दंगे, फसाद कराने की मूल जड़ भी हमारी राजनीतिक पार्टियां ही रही हैं, लेकिन इस परिपेक्ष्य में देश की जनता हमेशा जागरूक होती जा रही है। उसे राजनीतिक पार्टियों की मूल भावना समझ में आ गई है, लिहाजा, वह अपने मत का प्रयोग विवेकशीलता के साथ करने लगी है। उसके मन में विकास, रोजगार और तरक्की का खाका है। जिस पर राजनीतिक पार्टियों को भी अपना गोल सेट करना होगा। उनका यह फार्मुला किसी तरह से काम नहीं करेगा, जिसमें वे समाज को जाति-धर्म व सम्प्रदाय के नाम पर बांटने की कोशिश करते हैं।
Bisanji you are absolutely right..politics is becoming day by day worse..it has no ethics value.
ReplyDeleteYes, you are saying right. But, voters know everything and have power to change the system. Hope that ethics value will be change.
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