1 फ्यूल पर 'घमासान’ - the opinion times

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फ्यूल पर 'घमासान’



  

     By Bishan Papola May 22, 2018 
  
    विवेक एक नामी बैंक में काम करते हैं। वह प्रतिदिन घर और दफ्तर आने-जाने के लिए अपनी कार का इस्तेमाल करते हैं। वह कहते हैं कि जिस प्रकार पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़ रहे हैं, उससे तो लगता है कि मुझे अब कार के बजाय बाइक का इस्तेमाल करना पड़ेगा। इसी प्रकार एक सरकारी दफ्तर में काम करने वाले सुरेश ने कहा कि वह तो अब सोचने लगे हैं कि बाइक के बजाय साइकिल से चलाना शुरू कर दूं।

 हर दिन, जिस प्रकार पेट्रोलियम दामों में बढ़ोतरी हो रही है, उसमें यह पीड़ा महज विवेक और सुरेश की नहीं है, बल्कि हर शख्स इससे परेशान है, लेकिन सरकार यह कहते हुए कुछ नहीं कर पा रही है कि यह सारा ख्ोल अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल की दामों की बढ़ोतरी की वजह से है। और रेट बढ़ाने और घटाने का काम स्वयं तेल कंपनियां करती हैं। सरकार के इस तर्क के बीच यह सवाल उठता है कि अगर, यह ख्ोल कच्चे तेल की दामों में बढ़ोतरी और तेल कंपनियों का है तो जब भी चुनावों का दौर चलता है तो तब तेल की कीमतें स्थिर क्यों रहती हैं। कर्नाटक चुनाव इस बात की उदाहरण है। कर्नाटक में चुनाव-प्रचार के दौरान तेल के दामों में किसी प्रकार की कोई वृद्धि नहीं की गई, लेकिन जैसे ही कर्नाटक विधानसभा के लिए वोटिंग समा’ हुआ तो उसके बाद हर दिन तेल के दामों में वृद्धि होने लगी है।
 राजधानी दिल्ली में ही कुछ दिनों के अंतराल में ही पेट्रोल के दामों में 2.24 रुपए की वृद्धि हो चुकी है, जबकि डीजल के दामों में 2.15 रुपए की वृद्धि हो चुकी है। और आने वाले दिनों में इसी तरह पेट्रोल और डीजल के दाम बढ़ने की संभावना जताई जा रही है। अगर, ऐसे ही हालत रहे तो जनता में त्राहि-त्राहि मचना लाजिमी होगा।
 देश की जनता अलग-अलग पार्टियों को बहुमत देकर सत्ता तक इसीलिए पहुंचाती है, क्योंकि उससे जनता को कुछ भले की उम्मीद होती है। चाहे खाद्य पदार्थ हों या फिर पेट्रोलियम पदार्थ, ये ऐसी चीजें हैं, जो जनता के दैनिक जीवन से जुड़ी हुईं हैं। अगर, इनकी कीमतों में लगातार वृद्धि की जाती रहेगी तो निश्चित ही जनता की सांसें अटकने लगेंगी। खासकर, मध्यम और निम्न वर्ग के लोग तो इससे अधिक प्रभावित होंगे ही।
अगर, केंद्र सरकार यह कहकर अपना पल्ला झाड़ लेती है कि पेट्रोलियम पदार्थों के दाम बढ़ने के पीछे अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल की कीमतों में बढ़ोतरी होना वजह है तो उस वक्त दामों में कमी क्यों नहीं की गई, जब नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में 2०14 में सरकार चुनकर आई थी, उस वक्त अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल के दामों में कमी आई थी। नरेंद्र मोदी के पीएम बनने के एक साल से भी कम समय में कच्चे तेल की कीमत 113 डॉलर प्रति बैरल से घटकर 53 डॉलर प्रति बैरल हो गई थी। उस वक्त सरकार के लिए यह
किसी बड़ी खुशी से कम नहीं था, क्योंकि उस वक्त सरकार राजकोषीय घाटे से जूझ रही थी। उस वक्त विपक्ष को यहां तक कहने के लिए मजबूर होना पड़ा था कि यह मोदी सरकार का परफॉर्मेंस नहीं बल्कि उसकी अच्छी किस्मत है। 13 सितंबर 2०13 का दिन शायद बहुत कम लोगों को याद होगा, जब बीजेपी के कई नेता साइकिल लेकर सड़क पर इसीलिए उतरे थ्ो, क्योंकि वह यूपीए सरकार के दौरान तेल की कीमतों में वृद्धि का विरोध कर रहे थ्ो, इसमें रवि शंकर प्रसाद से लेकर कई अन्य बीजेपी नेता शामिल हुए, लेकिन उस वक्त तेल की कीमतों में वृद्धि का विरोध कर रहे नेता आज मोदी सरकार में अहम मंत्रालयों की जिम्मेदारी संभाले बैठे हैं। उस वक्त बीजेपी नेताओं ने यूपीए सरकार पर तेल कंपनियों के साथ सांठगांठ करने की आरोप लगाया था, तो अब ऐसा क्या हो गया कि केंद्र यह कह रही है कि दामों में वृद्धि के संबंध में उसका कोई रोल नहीं है।
इसे मोदी सरकार की अच्छी किस्मत ही कहेंगे कि केंद्र में मोदी सरकार बनने के पहले तीन सालों के दौरान अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में कमी आती-जाती रही है, लेकिन सरकार के तीन साल पूरे होने के बाद वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल के दाम 8० डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया और अब यह भी आशंका जताई जा रही है कि दाम 1०० डॉलर प्रति बैरल से भी अधिक पहुंच सकता है। इस वक्त राजधानी दिल्ली में पेट्रोल के दाम 76.87 रुपए प्रति लीटर हैं और डीजल के दाम 68.०8 रुपए प्रति लीटर हैं। अगर, यही स्थिति रही तो तेल दाम कहां पहुंचेंगे, उसका अंदाजा स्वत: ही लगाया जा सकता है, लेकिन सरकार इस मसले पर इसीलिए गंभीरता सोचे कि जब कच्चे तेल की दामों में कमी आई थी तो उस वक्त तेल की कीमतें भी कम होनी चाहिए थी, उस वक्त सरकार ने ऐसा कुछ किया नहीं, जब कच्चे तेल की कीमतें बढ़ रही हैं तो फिर जनता पर बोझ क्यों बढ़ाया जा रहा है। इसका सरकार टैक्स या एक्सराइज ड्यिूटी कम कर समाधान तलाश्ो। तभी सरकार का तर्क लोगों के गले उतर पाएगा।
  जिस समय कच्चे तेल की कीमतें कम थीं, तो उस वक्त सरकार ने पेट्रोल और डीजल पर टैक्स के रूप में काफी पैसा कमाया, लिहाजा, अंतर्राष्ट्रीय बाजार में इसकी कीमत बढ़ने पर सरकार टैक्स कम कर लोगों को राहत दे। वैसे भी, केंद्र सरकार ने नवंबर 2०14 से जनवरी 2०16 तक एक्साइज ड्यूटी में नौ बार बढ़ोतरी की, जबकि टैक्स में कटौती केवल एक 2०17 में अक्टूबर माह में की गई थी। ऐसे में, सरकार जनता को इस फार्मूेले से राहत दिलाए।

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