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भारत और 'कुपोषण’




    By Bishan Papola June 12, 2018 
   भारत धीरे-धीरे 'विश्व शक्ति के रूप में’ उभर रहा है। कई क्ष्ोत्रों में, जिस प्रकार संतुलन के साथ आगे बढ़ा जा रहा है, वह भारत की कामयाबी को इंगित करता है, लेकिन इस विकास की दौड़ में बहुत-सी समस्याएं आज भी वहीं बनी हुई हैं, जब हम उन समस्याओं से निपटने में उतने सक्षम नहीं थ्ो। इनमें से एक समस्या 'कुपोषण’ की है।  अगर, भारत के 'आर्थिक शक्ति’ बनने के इस दौर में आज देश के कई हिस्सों में 'मासूम बच्चे’ 'भूख की वजह से मर रहे हैं’ तो इसे क्या कहेंगे और हमारी आर्थिक शक्ति बनने के क्या मायने रह जाएंगे।
 मौजूदा वक्त में अगर 'झारखंड’ को ही उदाहरण के तौर पर ले लें तो तस्वीर स्पष्ट हो जाती है। इस साल 31 मई तक झारखंड में 'जमश्ोदपुर’ के 'महात्मा गांधी मैमोरियल मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल’ (एमजीएम) में कुपोषण की समस्या के मद्देनजर उपचार के लिए आए 2478 बच्चों में से 185 बच्चे दम तोड़ चुके हैं, जिनमें तो अधिकांश बच्चे नवजात थ्ो। हैरानी की बात यह है कि इसी अप्रैल माह में 47 बच्चों की मौत हुई है। 2०17 में भी एमजीएम मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल में 16० बच्चों की मौत हुई थी। यह मात्र एक अस्पताल का डाटा है, राज्यभर में और मौतें हुईं होंगी। 
 आकड़ों से अंदाजा लगाया जा सकता है कि देश में कुपोषण की समस्या कितनी गंभीर है। अगर, सरकारें इस समस्या को लेकर गंभीर होती तो निश्चित ही 2०17 के मुकाबले इस साल मरने वाले बच्चों का आकड़ा कम होता। झारखंड में जितनी मौतें 2०17 में हुईं, उससे भी अधिक मौतें तो इस साल महज पांच महीने के दौरान हो गईं। मध्यप्रदेश, राजस्थान सहित कई अन्य राज्यों में भी कुपोषण की समस्या दूर नहीं हो पाई है। 
 पूरे देश की तस्वीर जानने के लिए हमें 'संयुक्त राष्ट्र’ के आकड़ों पर नजर डालनी होगी। संयुक्त राष्ट्र के अनुसार भारत में हर साल कुपोषण की वजह से मरने वालों की संख्या 1० लाख से भी अधिक है। यह संख्या महज पांच साल से कम उम्र के बच्चों की है। 'दक्षिण एशियाई देशों’ में कुपोषण के मामले में भारत की यह तस्वीर चिंता पैदा करती है। देश के कई राज्यों में किए गए सर्वेक्षणों से यह बात स्पष्ट हुई है कि सबसे गरीब इलाकों में बच्चे भुखमरी की वजह से जान गवां रहे हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या इस समस्या पर ध्यान दिया जाता तो इन मौतों को नहीं रोका जा सकता था, बिल्कुल रोका जा सकता था। अगर, देश में गरीबी हटाने की बात आती है तो उस पर राजनीति तो खूब होती है, लेकिन जमीनी स्तर पर कोई काम नहीं होता है। लिहाजा, आज भी देश में गरीबी का स्तर कम नहीं हुआ है। बशर्ते, सरकारें अपनी साख बचाने के लिए किसी तरह के आकड़े क्यों न जारी करती हों, लेकिन वास्तविकता पर पर्दा नहीं डाला जा सकता है। 
एसीएफ (एक संगठन है, जिसने जनरेशनल न्यूट्रेशन प्रोग्राम की शुरूआत की है) की रिपोर्ट के अनुसार भारत में कुपोषण जितनी बड़ी समस्या है, वैसी पूरी दक्षिण एशिया में और कहीं भी देखने को नहीं मिलती है। रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत में अनुसूचित जनजाति(28%), अनुसूचित जाति (21%), पिछड़ी जाति (2०%), ग्रामीण समुदाय (21%) पर अत्यधिक कुपोषण का बहुत बड़ा बोझ है। कुपोषण बहुत घातक है। 18वीं सदी में कुपोषण ने यूरोप की 'जनसंख्या’ के एक बड़े हिस्से को निगल लिया था। तभी तो 'विश्व बैंक’ ने इसकी तुलना ब्लैक डेथ नामक महामारी से की है। भारत में अगर, केंद्र और राज्य सरकारें इस क्ष्ोत्र में थोड़ा-थोड़ा काम भी करें तो निश्चित ही इस समस्या से निपटा जा सकता है। बशर्ते, इसके लिए राजनीति के धरातल से ऊपर उठकर काम करना होगा। जब भूख और गरीबी राजनीतिक एजेंडे की प्राथमिकता नहीं होता है तो यह समस्या और गहरी हो जाती है। सरकारों की उदासीनता की वजह से ही भारत में कुपोषण की समस्या अधिक गरीब और कम विकसित पड़ोसियों जैसे बांग्लादेश और नेपाल से अधिक है। बांग्लादेश में अगर शिशु मृत्युदर 48 प्रति हजार है तो इसकी तुलना में भारत में यह 67 प्रति हजार है। यहां तक कि यह कई अफ्रीकी देशों से भी अधिक है। भारत में कुपोषण का दर लगभग 55 प्रतिशत है, जबकि उप-सहारीय अफ्रीका में यह 27 प्रतिशत के आसपास है। कुछ और देशों के साथ भारत की तुलनात्मक स्थिति देख्ों तो पांच वर्ष से कम उम्र के बच्चों में मृत्युदर की स्थिति कई देशों के मुकाबले ज्यादा गंभीर है। हम बांग्लदेश, ब्राजील, चीन, मिश्र, इंडोनेशिया, मैक्सिकों जैसे देशों से भी पीछे हैं। भारत में पांच वर्ष से कम उम्र के बच्चों में 'मृत्युदर’ प्रति हजार में 93 है तो बांग्लादेश में यह आकड़ा 77 है। ब्राजील में 36, चीन में महज नौ, मिश्र में 41, इंडोनेशिया में 45, मैक्सिकों में 29 ही है, हालांकि पाकिस्तान 1०9 व नाइजीरिया में 183 है। इन आकड़ों से अनुमान लगाया जा सकता है कि हम कुपोषण के मामले में पाकिस्तान से बहुत अच्छी स्थिति में नहीं हैं, बल्कि थोड़ी-सी बेहतर स्थिति में हैं। 'भारत’ और 'पाकिस्तान’ के गैप को देखा जाए तो यह कहना गलत नहीं होगा कि हम अपनी आर्थिक संपन्नता के मुकाबले कुपोषण से निपटने के मामले में निचले पायदान पर हैं। एक तरफ बच्चों को खाना नहीं मिल रहा है और दूसरी तरफ खाने की प्रचूर-मात्रा में बर्बादी हो रही है। 
 अगर, इन छोटी-छोटी चीजों पर ही ध्यान दिया जाने लगे तो कुपोषण की समस्या को काफी हद तक कम किया जा सकता है। दूसरी, 'चिकित्सीय प्रबंधन तंत्र’ को भी सुधारने की जरूरत है। जितने बच्चे अस्तपालों में उपचार के लिए आते हैं, उनमें से बहुत कम बच्चों को बचाया जाता है। इसके लिए अक्सर संसाधनों के अभाव को जिम्मेदार ठहराया जाता है। क्या सरकारें संसाधनों को नहीं बढ़ा सकती हैं। जिस देश में 'एक मुख्यमंत्री’ अपने 'घर की सजावट’ में 'सरकारी खजाने’ से '42 करोड़ रुपए’ खर्च कर सकता है, उस देश में अस्पतालों में संसाधन नहीं बढ़ाए जा सकते हैं। इसके लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति की जरूरत है। अगर, पार्टियां गरीबों व गरीबी के नाम पर 'राजनीतिक रोटियां’ सेंकने की प्रवृत्ति से ऊपर उठकर इस समस्या पर काम करें तो यह भारत जैसे देश के लिए कुपोषण से निपटना बहुत बड़ी चुनौती नहीं है। 


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