भारत और नेपाल केवल भौगोलिक
रूप से ही नहीं जुड़े हैं, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक रूप से भी गहरा संबंध रखते हैं। जी हां, मिथिलांचल
और मधेश के लोगों के बीच विवाह और पारिवारिक संबंध हैं, जिन्हें “रोटी-बेटी का रिश्ता” (भोजन और परिवार का संबंध) भी कहा जाता है। समाज
के इन संबंधों की बदौलत ही दोनों देश आपस में विपरीत माहौल के बाद भी अच्छे मित्र बने
रहते हैं। दोनों देशों के बीच खुली सीमाओं ने भी इन रिश्तों को और मजबूती देने का काम
किया है। वास्तव में, खुली सीमा न होती तो दोनों देशों के बीच सामाजिक और सांस्कृतिक
संबंध इतने मजबूत न हो
पाते। इनके बीच एक विशेष तरह का जुड़ाव हमेशा ही बना रहा। जब 1816 की सुगौली संधि के तहत
नेपाल को
ईस्ट इंडिया कंपनी ने विभाजित करके उससे कुछ तराई की उपजाऊ जमीन अलग कर दी थी तो
उसके बाद शासक
बदलते रहे और उनके साथ ही जमीन का स्वामित्व भी बदलता रहा, लेकिन मिथिलांचल और मधेश के लोगों के बीच “रोटी-बेटी” का रिश्ता
हमेशा ही कायम रहा। जनकपुर रेड क्रॉस के अध्यक्ष नरेश प्रसाद सिंह कहते हैं
कि मधेश के करीब 75 फीसदी लोगों की रिश्तेदारी उत्तर प्रदेश और बिहार में है|
नेपाल-भारत की सीमा पर रहने वाले बहुसंख्यक केवल मधेशी ही नहीं हैं, बल्कि सिक्किम और उत्तराखंड से सटे पहाड़ी इलाक़े के लोग भी हैं। इनका
भारत के साथ बहुत आत्मीय लगाव शुरू से ही बना रहा। भारत के लोग
भी मधेशी समुदायों
के साथ विशेष लगाव रखते हैं, लेकिन नेपाल के नए संविधान ने इस
युगों पुरानी
परंपरा में आमूलचूल बदलाव कर दिया है। इसमें कहा गया है कि मधेश में ब्याही जाने वाली
भारतीय औरतों को विदेशी माना जाएगा। पहले यह व्यवस्था थी कि मधेश में ब्याही जाने वाली
औरतें भारतीय नागरिकता को छोड़कर अपने पति की नागरिकता ले सकती थीं और नेपाल में रोजगार
पा सकती थीं, लेकिन अब हालत
बदल रहे हैं। नेपाल की
मौजूदा कम्युनिस्ट सरकार भी अपने ही देश के मधेसी लोगों पर
लगातार अत्याचार करती रहती है। भारत के साथ नेपाल की सीमा खुली है, ऐसे में मधेसी आंदोलनों का असर भारतीय सीमा
पर भी रहा है। इसके चलते
भारत नेपाल से मधेसियों के प्रजातांत्रिक अधिकारों की वकालत करता रहा है। इस बात को मधेशी समाज के लोग
भी समझते हैं। यही वजह कि नेपाल की विपरीत राजनीतिक हालातों के बीच भी “रोटी-बेटी” का संबंध
पहले की तरह ही बना हुआ है।
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