1 कोरोना: अब इसीलिए है कम्युनिटी स्प्रेड का खतरा | Corona: now there is a possibility of community-spread - the opinion times

कोरोना: अब इसीलिए है कम्युनिटी स्प्रेड का खतरा | Corona: now there is a possibility of community-spread

कुछ दिन पहले केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने कोरोना वायरस (Covid-19) की वजह से किस आयुवर्ग के कितने प्रतिशत लोगों की मौत हुई है से संबंधित आकड़े जारी किए हैं। इन आकड़ों से स्पष्ट होता है कि अभी कोरोना वायरस की वजह से जो मौतें हुईं हैं, उनमें सबसे अधिक यानि 39 प्रतिशत 60-74 आयुवर्ग के लोग शामिल हैं। इसके बाद 32 प्रतिशत वे लोग शामिल हैं, जिनकी उम्र 45-59 वर्ष के बीच है। इसके बाद 75 वर्ष आयुवर्ग या इससे अधिक उम्र के लोगों की मौत का आकड़ा 14 प्रतिशत है। 30-44 आयुवर्ग के लोगों का औसत 11 प्रतिशत है, जबकि 15-29 आयुवर्ग के लोगों का औसत 3 और 14 से कम आयुवर्ग के लोगों का औसत महज 1 प्रतिशत है। 1 अप्रैल 2020 को रिकवरी रेट 8.3 प्रतिशत था और 8 जुलाई को रिकवरी रेट का प्रतिशत 62 प्रतिशत तक पहुंच चुका है। इन आकड़ों को जारी कर स्वास्थ्य मंत्रालय ने यह बताने की कोशिश की है कि कोरोना वायरस (Covid-19) के संबंध में भारत की स्थिति अच्छी है। और अभी तक देश के अंदर कहीं भी कम्युनिटी स्प्रेड नहीं हुआ है, लेकिन यहां हमें केवल इस बात पर संतोष नहीं कर लेना चाहिए कि देश में अभी कम्युनिटी स्प्रेड नहीं हुआ है और इसकी चपेट में आने की वजह से होने वाली मौतों में उम्रदराज लोग ही अधिक हैं।


अभी कुछ जगहों को छोड़कर देश में लॉकडाउन की स्थिति नहीं है। और सोशल डिस्टेंशिंग का पालन भी लोग कम ही कर रहे हैं। लॉकडाउन की अपेक्षा लॉकडाउन खुलने के बाद कोरोना वायरस के मामलों में तेजी से बढ़ोतरी हुई है, जो कम्युनिटी स्प्रेड के खतरे को बढ़ाता है। शुरूआत में 1 लाख तक कोरोना संक्रमण के मामले पहुंचने में 78 दिनों का समय लगा था। यह समय 2 मार्च से 18 मई तक का था। इसके बाद अगले 1 लाख मामले केवल 15 दिनों के अंदर आ गए थे। यह समय 18 मई से 2 जून के बीच का था। इसके आगे 1 लाख मामले तो महज 10 दिनों के अंदर ही सामने आ गए थे। इन मामलों के सामने आने में महज 2 जून से 12 जून का समय ही लगा था। फिर अगले 1 लाख मामले महज 8 दिनों के अंदर यानि 12 जून से 20 जून के बीच ही सामने आ गए थे। 20 जून से 26 जून के दौरान यानि महज 6 दिनों के अंदर अगले 1 लाख मामले सामने आए थे। अब 1 लाख मामले सामने आने का समय महज 4 दिनों तक पहुंच चुका है और भारत में कुल मामलों की संख्या 8,21,388 हो गई है, इनमें से 22,139 लोगों की मौत हो चुकी है। अब जब देश में लॉकडाउन नहीं है। कामकाज सामान्य दिनों की तरह ही चालू हो चुका है। लोगों के इधर-उधर आने-जाने में कोई रोकटोक नहीं है, तो निश्चित ही इन परिस्थितियों में मामले बढेंगे ही। अब परिस्थितियां ऐसी हो गईं हैं कि न तो लोग सोशल डिस्टेंशिंग और न ही दूसरे नियमों का पालन करने में दिलचस्पी ले रहे हैं और न ही स्थानीय प्रशासन पहले की तरह सक्रिय दिख रहा है। क्वांरटीन सेंटर्स को लेकर जो गंभीरता शुरूआत में दिखी थी, अब उसमें भी कमी देखने को मिल रही है।
जब मार्च में लॉकडाउन लगाया गया था, इसी बीच शहरों से लाखों की भीड़ गांवों की तरफ पलायन कर गई थी। केंद्र व राज्य सरकारों को लगा कि शहरों की यह भीड़ अब कुछ समय गांवों में ही रहेगी। अगर, भीड़ एक जगह ठहर जाएगी तो कम्युनिटी स्प्रेड का खतरा बिल्कुल भी नहीं रहेगा। लेकिन अब यह स्थिति नहीं है। लोगों का वापस शहरों की तरफ पलायन शुरू हो चुका है। फैक्ट्रियों, कंपनियों व अन्य कार्यस्थलों में काम चालू हो गया है तो लोग गांवों से शहरों की तरफ आने लगे हैं। भले ही, सरकारी तंत्र एक फिर पलायन करने वाले लोगों पर ही दोषारोपण करे और कहे उन्हें एक जगह पर रूक जाना चाहिए था, लेकिन ऐसे लोगों के पास गांवों की तरफ जाने के समय जो मजबूरी थी, वही मजबूरी अब भी है। इसीलिए उनके पास गांव से लौटने के सिवाय कोई दूसरा विकल्प नहीं है। इसके पीछे केंद्र के साथ-साथ राज्य सरकारों की भी खामी है, क्योंकि जिस अंदाज में सरकारों ने पलायन कर गांव गए लोगों को रोजगार देने की बात कही थी, वह कहीं न कहीं पूरी नहीं हो पा रही है और गांवों में केवल मनरेगा के भरोसे कितने लोगों को रोजगार दिया जा सकता है ? स्वरोजगार के लिए लोन मिलने में जो जटिलताएं हैं, वे भी परेशान करने वाली होती हैं। योजनाओं के कागजों तक सीमित रहने का चलन भी हमारे देश में कोई नया नहीं है। इसीलिए इस चलन से भी लोग वाकिब हैं। केंद्र और राज्य सरकारों ने देश के करोड़ों लोगों को मुफ्त राशन देने की बात की थी, लेकिन वास्तविकता देखी जाए तो सरकार के इस अभियान में भी कालाबाजारियों की कालीछाया ही देखने को मिली। बहुत से लोगों तक राशन पहुंचा ही नहीं। किसी के पास पहुंचा भी तो केवल एक बार। ऐसे में, उन लोगों के पास काम पर लौटने के सिवाय कोई दूसरा विकल्प नहीं रह जाता है। ऐसे लोगों के सामने दोहरा संकट है। भूख या फिर कोरोना। उनके सामने प्राथमिकता भूख मिटाने की है। लिहाजा, उन्हें काम पर लौटना ही पड़ेगा।
यहां जिम्मेदारी शासन-प्रशासन की है। जब केंद्र सरकार ने लाखों करोड़ रूपए के आर्थिक पैकेज का ऐलान किया, तो फिर भी न तो लोगों का पलायन रूक सका, न जॉब क्रिएट हो सके और न ही लोगों की भूख मिटाने का इंतजाम हो सका। आज देखें तो परिस्थितियां और विकट होने जा रही हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन भी इस बात को लेकर चेतावनी दे चुका है कि अभी कोरोना का पीक आना बाकी है। दुनिया भर में कोरोना की वजह से जो हालात पैदा हुए हैं और अभी तक इस बीमारी से लड़ने की कोई वैक्सीन नहीं बनी है। ऐसे में, सभी जानते हैं कि हमें कोरोना के साथ जीना सीखना होगा, लेकिन अधिकांशत: इसका असर केवल आम लोगों को ही झेलना पड़ेगा, क्योंकि उनकी उच्च स्वास्थ्य सुविधाओं तक इतनी अच्छी पहुंच है ही नहीं। और कोरोना का इलाज भी आम आदमी की जेब पर भारी वजन डालने वाला है। दूसरी तरफ, अमीर लोगों के पास कोरोना से बचने के विकल्प भी अधिक हैं और उपचार के भी। इन परिस्थितियों में स्वयं लोगों की जिम्मेदारी तो बढ़ ही जाती है, बल्कि शासन-प्रशासन की जिम्मेदारी उससे भी अधिक बढ़ जाती है। भीड़-भाड़ वाले इलाकों में सोशल डिस्टेंशिंग का पालन करवाया जाए और क्वांरटीन की जो व्यवस्था पहले थी, उसका भी पालन किया जाए। जब कोई शख्स एक-दूसरे राज्य, शहर, जिला, कस्बा या गांव आदि में जाता है तो उसकी प्राथमिक जांच हो, जिससे उसके संदिग्धता का पता लगाया जा सके। कार्यस्थलों पर सैनेटाइजिंग की उचित व्यवस्था है या नहीं, इसको लेकर भी सतर्कता बरतने की जरूरत है। संस्थान की तरफ से इसका ध्यान तो दिया ही जाए, बल्कि पुलिस-प्रशासन की टीम भी इसमें समय-समय पर निगाह रखे। इसके अतिरिक्त छोटे-छोटे लॉकडाउन से कोरोना के मामले कम होने वाले नहीं हैं, बल्कि इसको कम से कम दो सप्ताह का रखा जाए, यह सुझाव हाल ही में एम्स के निदेशक डा. रणदीप गुलेरिया दे चुके हैं। 
सरकार को कोरोना का इलाज और सस्ता करने की तरफ भी कदम उठाने चाहिए। अब लॉकडाउन खत्म हो गया तो कम्युनिटी स्प्रेड का खतरा भी बढ़ गया है। अगर, आने वाले दिनों कम्युनिटी स्प्रेड हो जाता है तो इसमें बहुत से वही लोग चपेट में आएंगे, जो कम आमदनी करने वाले लोग होते हैं, क्योंकि उनकी बाध्यताएं ऐसी होती हैं कि वे चाहकर भी कोरोना से बचाव के लिए बने नियमों का पालन नहीं कर सकते हैं। उन्हें समय पर उचित और सस्ता इलाज दिलाना होगा। इसी से बढ़ते मामलों को जल्दी-जल्दी नियंत्रित करने में मदद मिल पाएगी।

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