1 उम्मीदों पर 'चोट’ - the opinion times

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उम्मीदों पर 'चोट’


   'आम आदमी पार्टी’ एक बार फिर चर्चा में है। दो चीजों के लिए। पहला पार्टी के दो प्रमुख नेताओं के इस्तीफे की वजह से। दूसरा, दिल्ली में 'राशन वितरण प्रणाली’ में घपले की वजह से। ये दोनों विषय ऐसे हैं, जो पार्टी के मूल चरित्र को सामने लाने के लिए काफी हैं। पार्टी के दो नेताओं 'आशुतोष’ और 'आशीष ख्ोतान’ के इस्तीफे के मामले में स्वयं पार्टी के अंदर की 'लोकतांत्रिक प्रणाली’ पर सवाल खड़ा होता है तो 'राशन वितरण प्रणाली’ में घपले की बात सामने आने से पार्टी की जनता के प्रति जवाबदेही की गंभीरता पता चलती है। पार्टी के इस दोहरे चरित्र से लोगों की उन 'उम्मीदों को चोट’ पहुंची है, जो उन्होंने एक ऐसे दौर में देख्ो, जिस दौर में हर पार्टी स्वार्थहित के दलदल में फंसी हो, आम जनता के सपनों को पार्टियां 'राजनीतिक रोटियां’ बनाकर चबा रहीं हों, राजनीतिक जमीन पर 'धर्म’, 'सम्प्रदाय’, 'जातिगत’ और 'परिवारवाद’ को बढ़ावा देने का खुला कुचक्र रचा जा रहा हो। 'लोकतांत्रिक प्रणाली’ की व्यवस्था को इस तरह से परिभाषित किया जा रहा हो, जिसमें 'आम आदमी’ की तरक्की तो कहीं नजर ही नहीं आई। चंद लोग अपनी तरक्की करने के बाद यह कहने लगे कि देश ने काफी विकास किया है। हम मजबूत स्थिति हैं। ऐसे लोगों ने जमीन पर उतरकर नहीं देखा कि देश आज भी 'अशिक्षा’, 'कुपोषण’, 'भयंकर गरीबी’ जैसी समस्याओं से जूझ रहा है। 


 'आम आदमी पार्टी’ बनाने पर जब जनता के लिए कुछ कर गुजरने के सपने दिखाए गए तो लगा कि हां, शायद देश एक नई क्रांति की तरफ बढ़ रहा है। दिल्ली में हुए पार्टी के ऐलान की चर्चा पूरे देश में हुई। आम आदमी को लगा कि कोई हमारी आवाज को बुलंद करने वाला आगे आया है, लेकिन आम आदमी पार्टी अपने जन्म से ही जिस तरह के विवादों में घिरती आई है, उससे कहीं भी ऐसा नहीं लगता है कि 'दिल्ली’ की जनता का नेतृत्व कोई 'आम आदमी’ कर रहा है। बहुत से मुद्दे हैं, जिन्हें आसानी से गिनाया भी नहीं जा सकता है। 'लोकपाल आंदोलन’ को लेकर जितने लोग एकजुट हुए थ्ो, उन्होंने पार्टी बनते ही 'अरविंद केजरीवाल’ से किनारा कर लिया, क्योंकि पार्टी के अंदर 'तानाशाही’ की जो प्रवृत्ति शुरू से चली आई है, वह उन विचारों के लिए घातक सिद्ध हुई, जो व्यवस्था और कुछ गलत के खिलाफ सामने आ जाते थ्ो। पिछली अवधि के दौरान यह देखने को मिला कि पार्टी अक्सर अपनी कमियों को छुपाने के लिए कुछ नई-नई चीजें सामने लाती रही है,लेकिन झूठ पर कब तक पर्दा डाला जाता रहेगा। 'यह जनता है सब जानती है’।
'आम आदमी पार्टी’ ने सत्ता में आते ही वादों की झड़ी लगा दी थी। मुख्य रूप से बिजली, पानी व स्वास्थ्य से जुड़ा हुआ सवाल आता है। बिजली के दाम जहां 5० फीसदी तक घटाए वहीं, पानी 2० हजार लीटर तक मुफ्त किया। क्या सरकार इस सच्चाई को नहीं जानती कि दिल्ली में कितने घंटे बिजली मिल रही है और पानी की किल्लत कितनी खत्म हो पाई है? दिल्ली के लोग बताते हैं कि दिल्ली में कब बिजली चली जाए और कितने घंटे के लिए चली जाए, इसका कोई अंदाजा नहीं रहता है। गर्मी के सीजन में दिल्ली में पानी की किल्लत के संबंध में सभी लोग जानते हैं। स्वास्थ्य व्यवस्था की बात करें तो वह भी बदहाली के दौर से गुजर रही है। 'मोहल्ला क्लीनिक’ के माध्यम से 'आम आदमी पार्टी’ की 'सरकार’ ने दिल्ली में चरमराई स्वास्थ्य व्यवस्था को ठीक करने की मुहिम शुरू की थी। जगह-जगह मोहल्ला क्लीनिक इसीलिए खोले गए कि जो लोग बड़े अस्पतालों में उपचार के लिए नहीं जा सकते हैं, उन्हें राहत मिलेगी, लेकिन मोहल्ला क्लीनिकों की दिल्ली में क्या हालत हो गई है, यह बात किसी से छुपी नहीं है। मोहल्ला क्लीनिकों के लिए बनाए गए कमरे आदि आज शराब, अय्याशी व नश्ोडिèयों के अड्डे बने हुए हैं। अब दिल्ली सरकार इन खस्ता हाल 'मोहल्ला क्लीनिकों’ की हालत सुधारने के लिए क्यों आगे नहीं आ रही है ? 
 'सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था’ की हालत भी जगजाहिर है। 'आप’ की सरकार ने वादा किया था कि 'सार्वजनिक परिवहन’ में काफी सुधार किया जाएगा, लेकिन सरकार 'डीटीसी’ के बेड़े में नई बसों को जोड़ने में भी नाकाम रही है। वहीं, सार्वजनिक क्ष्ोत्रों में 'वाई-फाई’ सुविधा मुहैया कराने का वादा भी वादा ही रह गया है। दो साल बाद भी राष्ट्रीय राजधानी आज भी नि:शुल्क वाई-फाई सेवाओं का इंतजार कर रही है। दिल्ली में 'सीसीटीवी’ कैमरे लगाने का भी वादा किया गया, लेकिन आम आदमी पार्टी की सरकार इसमें भी नाकाम साबित हुई। सरकार की यह योजना अभी तक ठीक से पटल पर नहीं उतर पाई है। 'राशन वितरण प्रणाली’ में भी घपले की बात सामने आ रही है। जनता राशन के लिए तरस रही है और मंत्री, नेता, अफसर और राशन के नाम अपने व्यारे-न्यारे करने में लगे हुए हैं। ऐसे में, आम आदमी पार्टी भी यह उम्मीद बिल्कुल भी न पाले कि उसने अपने उद्भव के बाद कुछ नया कर दिया है, अन्य पार्टियों से वह बेहतर स्थिति है, जनता में उसकी स्वीकार्यता आज भी वैसी ही है, जैसे पहले थी। 
 'दोहरे चरित्र’ का ख्ोल बेहद खतरनाक होता है। अगर, एक पार्टी के अंदर ये सब बातें देखने को मिलती हैं तो पहले तो जनता के लिए घातक होता है, फिर स्वयं पार्टी के लिए। आप जनता के बीच जाकर कुछ भी बोल दें, लेकिन आपके मूल चरित्र की झलक आपके कार्यों में निश्चित ही सामने आती है। देश विकास की तरफ आगे बढ़ रहा है तो आंतरिक समस्याओं से भी जूझ रहा है। इसके लिए हमारी 'राजनीतिक पार्टियां’ जिम्मेदार हैं। देश में समय के साथ-साथ नई पार्टियों का उद्भव हुआ। मुख्य रूप से क्ष्ोत्रीय स्तर पर, उनकी विचारधाराएं अलग हैं, क्योंकि जब किसी पार्टी का उद्भव होता है तो वह एक 'विचारधारा’ लेकर पैदा होती है। उसी विचारधारा के आधार पर वह जनता के बीच स्वयं को स्थापित करती है, लेकिन इस दौर में पार्टियों के अंदर विचारधारा वाली कोई बात समझ में नहीं आती है। अपने हित के लिए राजनीति पार्टियां, जिस प्रकार अपनी विचारधारा को सूली पर चढ़ाने में तुली रहती हैं, उसमें 'लोकतंत्र’ की साख कैसे मजबूत हो सकती है ?




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